'मरिया' छत्तीसगढ़ी कहानी-chhattisgarhi kahani

मरिया-Maria ।छत्तीसगढ़ी कहानी-Chhattisgarhi kahani

छत्तीसगढ़ी कहानियां । chhattisgarhi kahani

डा. परदेशी राम वर्मा के द्वारा मरीया छत्तीसगढ़ी कहानी मरिया का लेखन किया गया है। मरीया छत्तीसगढ़ीया बोली की काफी लोक प्रिया कहानि है। इसे पढ़े-

संझौती जल्दी नाँगर ल ढील देकर बेटा – रामचरण अपन एकलौता पोसवा बेटा ला समझइस।

रामचरण के बाई मुच ले हाँस दिस। हाँसत देखि त ओकर बेटा सिकुमार पूछिस- काबर हाँसे दाई? ददा ह बने त किहिस। सँझौती जल्दी ढील दे नाँगर ल काहब म हाँसी काबर आईस भई?

दाई किहिस – देख बेटा, तोरो अब लोग-लइका होगे। तोर उम्मर बाढ़ गे फेर तोर ददा के मया ल मैं देखथँव ग। ददा बर लइका ह जनमभर लइके रिथे रे। तेमा एक ठन बेटा। एक बेटा अउ एक आँखी के गजब मया ग। डोकरा के मया ल देखेंव त हाँस परेंव।

अभी ये गोठ-बात चलते रिहिस। डोकरा उठिस खटिया ले अउ दम्म ले गिर गे। एक ठन गोड़ लझम पर गे। डोकरा ल देख के दाई चिचअइस – सिकुमार दउड़ त बेटा, लथरे अस करथ हे गा। सिकुमार दउड़ के अइस। ददा के एक पाँव, एक हाथ झूल गे। ददा मचिया म एकंगी परे रहिगे। देखो-देखो होगे।

चरणदास बइद ल बलइन। रमेसर मंडल आगे। मनराखन चोंगी पियत खखारत अइस। जे मुँह ते बात लोकवा तो होगे रे सिकुमार, बइद ह बतइस।

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मनराखन किहिस- ओकरे सेती मंय किथँव चार सावन सम्मारी जरूरी हे सवनाही नई मनावन।

किसानी करबो काहस रे सिकुमार। देख डोकरा ल का होगे। धरम-करम ल बंठाधार करे मे रे बाबू बिपत आथे जी।

रमेसर मंडल किहिस- ये ला चरौदा अस्पताल लेगव जी। जल्दी करव, रामू रोसियागे, किहिस- का चरौदा अस्पताल जाही। मर गेव तुम अंगरेजी दवा के मारे। जाही डोकर हा बघेरा। गोली खाही अउ तेल लगाही तहाँ देख कुदल्ला मारही।

अंकलहा खिसियागे, किहिस- देखो जी, जतर-कतर बात झन करव। कथे -चढ़ौ तिवारी चढ़ौ पाण्डे, घोड़वा गइस पराय। तउन हाल झन होय। अरे ददा जहाँ लेगना हे लेगव। फेर थोरूक सिकुमार ल पूछ लव। सिकुमार ल पूछे के नवबदे नइ अइस। डोकरा के छोटे भाई बल्दू हा किहिस- देखव जी, सब बात के एकै ठन। हम तो सुक्खा सनाथन।

घर म भुँजी भाँग नहीं अउ …….

ओकर बात ल काट के अंकलहा किहिस – देख बल्दू घर में राहय ते झन राहयख् सेवा करे बर परही। लेगव येला जल्दी।

मचोली में एकंगू सुते-सुते डोकरा काँखिस। किहिस- देखव जी, अब मय जादा दिन के सगा नोहँव।

इही गाँव में जनमेंव। इहाँ खेलेंव-कूदेंव। इहें जवान होयेंव। इहें बूढ़ा गेंव अउ इहें बीमार हो गेंव। त भइया हो,

इहें मरन दव मोला। मोर दसो अंगरी के विनय हे।

अइसे कहत डोकरा ह दुनों हाथ ल जोरे चाहिस, फेर हाथ ह उठय त लझम परगे रहय एक हाथ हा। डोकरा के आँसू निकलगे।

सिकुमार ल बइद हा दवा बता दिस, अउ किहिस तेलमालिस ज्यादा होय चाही बाबू, अउ सुन सँझौती लान लेबे कारी परेवा। करिया परेवा खवा अउ लहू म मालिस कर, देख फेर तोर ददा कइसे बने होही। सब झन जइसने आय रिहिन तइसने चल दिन। सिकुमार भिड़गे सेवा करब म। एक पंदरही नई बीतिस डोकरा भगवान घर रेंग दिस।

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दुब्बर बर दू असाढ़ होगे। एती खेती-खार फदके राहय। ओ डाहर डोकरा के कारज माड़ गे। गाँव म बइठना बलइन। सिकुमार अरजी करिस- हमर समाज म मरिया भात ल बंद करव किथें सब। महूँ ह विनती करत हँव भई। मरिया भात ल समाज बंगा छोड़ देतिस।

 

रमेसर मंडल सदा दिन के समाजिक मनखे। रखमखा के उठगे, किहिस देख रे सिकुमार समाज के कान्हून ल हमला झन बता रे बाबू। कान्हून ल हम जानथन। कान्हून हिरसिंग दिरखिन बारे ल सब हम पढ़े बइठे हन जी। करनी दिखय मरनी के बेर। मँय गाँव के पटेल मँय गाँव समाज के कुरहा। बाबू रे, तोर बाप ह जियतभर कान्हून बर ठठ्ठा मड़इस, अब मरे म झन ठठ्ठा कर। दे बर परही भात। सब घर फुदर-फुदर के खाय हव, अब खवाय बर परत हे त कान्हून ल गोहराहू रे।

सब झन रमेसर के संग दे दिन। सिकुमार हो गे अकेल्ला। भात देवर माने ल परगे।

घर डाहर आवत खानी रमेसर ल सुकालू किहिस- अच्छा जम्हेड़े भाँटो, बिछलत रिहिस बुजा ह।

बिछलत रिहिस बुजा ह। अब उड़ाबो-लडुवा- पपची डट के।

रमेसर ओकर पीठ म एक मुटका मारिस अउ हाँस के कहिस-उहाँ तो मुँह म लडुवा गोंजे रेहे रे। अउ अब पपची बर नियत गड़िया देस। तोर बर केहे हे रे बाबू, ’’छिये बर, न कोड़े बर, धरे बर खोखला।’’

हाना सुन-सुना के हाँसत मुचमुचावत सारा-भाँटो घर आ गे। सिकुमार के होगे जग अँधियार।

घर आके सिकुमार अपन दाई ल सब बतइस। दाई किहिस- पंच मन कुछु नइ किहिन रे। सिकुमार किहिस-दाई, सब किहिन तोर अँगना म खाबो, तिहि बहुत बड़ बात ये। पबरित करबो काहत हें।

दाई किहिस- बुड़ा के काहत हें नहकौनी दे। वाह रे जमाना। दुनिया कहाँ ले कहाँ आगे रे। हमरो उम्मर पहागे सब देखत देखत पढ़ई-लिखई बहुत होगे बाबू, फेर दुनिया उहें के उहें हे। अरे! जब समाज के बड़े मन रइपुर के अधिवेशन म तय कर दीन के मरिया के भात खववनी बंद करे चाही त बंद कर देबर चाही। फेर वाह रे मनुख जात। करे के आन, केहे के आन। नियम बनाये हें के नेवता खाय बर साते झन जाहीं, फेर जाथें सत्तर झन। मट-मटमट-मट। मोटर-गाड़ी से भरा के नेवता खाय बन जाथें। अब तो बाबू रे, माई लोगन घलो जात हें नेवता खाय बर। एसो बड़े मंगह पारा बिहाव होइस त टूरी मन नेवता खाय बन आगें। अउ बरात म जो टूरा मन नाचिन।

सब मंद मउहा पीये रथें, नाचबे करहीं। सिकुमार समझइस।

दाई किहिस’-मंदे मउहा त पीही रे बाबू। तोर बाबू त चल दिस। गजब बड़ नाचा के कलाकार ग। खुदे गीत बनावय। हमरे गाँव के समारू अउ रिखी जोक्कड़ राहँय। कुछु नई जमिस त तोर बाबू गीत बनइस ग….

रिखि राम सोच के काहत हे समारू ल दूध-दही पीबोन भइया, नई पीयन दारू ल।

फेर होत हे उल्टा, दूध-दही नँदा गे। सब धर लिन दारू। दारू पी के पंचइती करथें। अउ मरिया के भात ल खाय बिन नइ राहन किथें। काहत-काहत दाई रो डारिस।

मरता क्या न करता। आखिर दो एक्कड़ खेत बेंचागे। खात-खवई म सिरागे रुपिया। खेत गय त बइला ला घलो बेच दिस सिकुमार, खेतिहर, किसान ले मजदूर होंगे। बनिहार होगे। रेडिया म गीत बाजय

अब बनिहार मन किसान होगे रे, हमर देस म बिहान होगे रे।

त सिकुमार रो डरय। ओ सोचय कोन जनी कहाँ के मजदूर किसान होगे। मँय तो किसान ले मजदूर होगेंव। बनिहार होगेंव।

ठलहा का करतिस, बनिहारी करे लागिस। एक दिन गाँव के चटरू भूखन ह ओला किहिस-सिुकुमार, पुलुस बनबे?

सिकुमार अकबकागे। पूछिस- कोन मोला पुलुस बनाही भाई? भूखन किहिस- करे करम के नागर ल भुतवा जोतय। तोर बर मौका हे। मँय रोज जाथंव भेलई। उहाँ हे रामनगीना सिंह। हमर दोस। ओकर पुलुस कंपनी हे। पाँच सौ रुपिया लागही। ओला देबे त ओ हा तोला पुलुस बना दिही। तँय तौ चौथी पास हस। धीरे-धीरे बने काम करबे त हवलदार हो जबे।

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सिकुमार किहिस- कस जी, कइसे पाँच सौ म पुलुस बन जाहूँ। ठठ्ठा झन मड़ा रे भाई।

भूखन किहिस- तोला पेड़ गिनना हे ते आमा खाना हे जी। पुलुस के काम। ड्रेस पुलुस के। ठाठ के काम रिही। आजकल प्रावेट पुलुस हें। उही मन सब सुरच्छा के काम देखथें। आगू आ, आगू पा। किथें नहीं, आगम भँइसा पानी पीये, पीछू के पावय चिखला। अभी भरती चलत हे। काल तँय बता दे बाबू।

सिकुमार संसों म परगे। अपन बाई ल बतइस। बाई किहिस मोर सों साँटी बाँचे हे। ले जाव। बेच लव। तुम रइहू ते कतको साँटी आ जही।

सिकुमार किहिस- इही ले कहे गे रहे तन बन नइये ल, जाय बर कलकत्ता। खाय बर घर म चाउँर नईये मैं पुलुस बने बन तोरे गोड़ के गहना उतारत हँव।

बाई किहिस- दुख सब उपर आथे। राजा नल पर बिपत परे तब भूँजे मछरी दाहरा म कुदगे। समे ताय सिकुमार बाई के बात ल मान गे। साँटी बेचागे। दूसर दिन भूखन संग गीस। रामनगीना संग ओला देख के किहिस- वाह जवान। खाने को बासी, मगर देखो शरीर। जबर जवान हे भाई। भरती कर लेते हैं भाई बाकी काम तगड़ा है, हिम्मत का है खेत नहीं जोतना है। दादागिरी का मुकाबला करना है। कर सकोगे न।

सिकुमार अपन काम के जगा म गीस। तोड़फोड करइया साहेब मन गाड़ी म बइठ गे रहय। सिकुमार पाछू के डाला म बइठगे। गाड़ी चल परिस। जाके नरवा तीर के एक गजब बड़ घर म गाड़ी रुक गे। साहेब मन अपन दल के तोड़ फोड़ वाला मन ल किहिस- धरव रे भइँस मन ल। चढ़ावव गाड़ी म । तोड़ दव सब खटाल ल।

अतका सुनना रिहिस के खटाल मालिक लउठी बेड़गा धर के आगे। लगिन गारी देय। अब सब साहेब गाड़ी म चढ़ गें। गाड़ी भर्र के भगा गे। बाँच गे सिकुमार। खटालवाला मन ओही ल पा परिन। गजब बजेड़िन अउ छोड दिन, मूडी कान फूट गे सिकुमार के। रोवत ललावत कइसनों करके अपने दफ्तर अइस। अपन साहेब रामनगीना ल किहिस- साहेब मार खवाय बर कहाँ भेज दे रहेव। गजब ठठाय हे ददा। देख लव।

रामनगीना किहिस- अरे घोंचू, तुम्हारी आज से छुट्टी। मार खाके आनेवाले का यहाँ क्या काम। जाओ अपने गाँव। भूल जाओ नौकरी।

सिकुमार किहिस- सरजी, आनके कारन मार खायेंव। दवा दारू बर कुछु देहू के नहीं। अब रामनगीना गुसियागे। किहिस- भागता है कि नहीं, कि दूँ एकाद हाथ मैं भी। बड़े आये हैं दवा का पैसा मांगने। अरे जिनसे मार खाकर आया है उनसे मांग। हम क्यों देंगे?

ये तरा ले सिकुमार के छूट गे नौकरी। घर म ओकर महतारी अऊ घरवाली नइ बोलिन। गाँव के हितु पिरितु सकलइन अउ किहिन- देखों जी बाहरी मनखे मन तोला कइसे मरवा दिन। तोला रोजी माँगे बर बाहरी मनखे करा नइ जाना रिहिस।

सिकुमार किहिस- देखो जी, कहावत है- भूख न चीन्हें जात कुजात, नींद न चीन्हें अवघट घाट। बाहरी हा तो हाडा़ गोड़ा टोरवा दिस अउ तूमन सदा दिन के संग के रहैया मन का कमती करेव। बाप के मरिया के भात नई छोड़ेव। मोर खेती बेचागे। में किसान ले मजदूर होगेंव।

गरीब बर सब के चलथे, घरवाला और बाहरी सब गरिबहा ल ठठाथे। अपन अउ बिरान सब भरम ताय। अब भइया हो अंते-तंते बात छोड़व। जउन होगे तउन होगे। जिनगी भर सीखे बर परथे। मोर बर गाँव के पटेल अउ भेलई के रामनगीना सिंह दूनों बरोबर हे।

मोरो दिन बहुरही। किसान ले मैं बनिहार हो गेंव। तुँहर बात मानके मरिया-हरिया के भात खवा के लइका मन के मुँह म पेच गोंज पारेंव। अब कहाँ हे मरियाभात खवइया समाज? तेकर सेती भइया में सोच डारेंव, बाँह भरोसा तीन परोसा। न जात, न कुटुम, न अपन, न बिरान। धन ले धरम हे। अब ककरो उभरौती म नइ आवँव।

देख सुनके रेगिहँव। अब तो चारों मुड़ा अंधियार हे। आती के धोती, जाती के लिंगोटी। ओकर दुख ल देख के बिसाहू किहिस- सिकुमार! भले अकेल्ला रहि जते फेर खेत बेंच के मरिया के भात झन खवाते। जीयत हें तेकर बर सोचना चाहीं देखा-देखी नइ करे चाही सिकुमार।

सिकुमार किहिस- चेथी के आँखी अब आगू डाहर अइस बिसाहू। अब तो एक ठन परन है, मर भले जहूँ फेर मरिया के भात नइ खवावँव।

 

 

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