भारत की मृदा मिट्टी| Bharat Ki Mitti | Soils Of India

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भारत की मृदा/ मिट्टी bharat ki mitti




भारत की मृदा परिचय

  • मिट्टी के अध्ययन
    के विज्ञान को मृदा विज्ञान (पेडोलाजी) pedology कहा जाता है।
  • 1953 में केन्द्रीरीय
    मृदा सरंक्षण बोर्ड का गठन किया गया।
  • मृदा शब्द की
    उत्पति लैटिन भाषा के शब्द
    ‘‘सोलम’’ solam से हुई है, जिसका अर्थ है- फर्श
  • मूल चट्टानो,
    जलवायु, भूमिगत उच्चावच, जीवो के व्यवहार तथा समय से मृदा अपने मूल स्वरूप में आती है अथवा
    प्रभावित होती है। मृदा में सबसे अधिक मात्रा में क्वार्टज खनिज पाया जाता है।
  • ऐपेटाइट नामक
    खनिज से मृदा को सबसे अधिक मात्रा में फास्फोरस प्राप्त होता है। वनस्पति मिट्टी
    में हृामस humush की मात्रा निर्धारित करती है।
  • मृदा में
    सामान्यतः जल 25 प्रतिशत होता है।
  • जलवायु मिट्टी
    में लवणीकरण
    , क्षारीयकरण, कैल्सीकरण,
    पाइजोलीकरण में सबसे महत्वपूर्ण कारक है।
  • मृदा को जीवीत
    तंत्र
    की उपमा प्रदान की गई है।

भारतीय मृदा का
वर्गीकरण

भारत की मृदा/ मिट्टी soils of india
भारत की मृदा/ मिट्टी soils of india
photo capsion from-www.mapsofindia.com

भारतीय कृषि
अनुसंधान परिषद ने 1986 में देश में 8 प्रमुख तथा 27 गौण प्रकार की मृदा की पहचान
की है। प्रमुख आठ प्रकार की मृदा का विवरण इस प्रकार है-

1. जलोढ मिट्टी jalodh mrida 

  • यह भारत में लगभग 15 लाख वर्ग कि.मी. (43.4%)
    क्षेत्र पर विस्तृत है। ये नदियों द्वारा निर्मित मैदानी भाग मे पजांब से असम तक तथा
    नर्मदा
    , तात्पी, महानदी, गोदावरी, कृष्णाकावेरी के तटवर्ती भागो मे विस्तृत
    है। 
  • यह मिट्टी उच्च भागो में अपरिपक्व तथा निम्न क्षेत्रो में परिपक्व है। नई जलोढ
    मिट्टी
    से निर्मित मैदान खादर कहलाते है तथा पुरानी जलोढ मिट्टी
    के मैदान बांगर
    कहलाते है। बांगर के निर्माण में चीका मिट्टी का सर्वाधिक योगदान रहता है। इनमें
    पोटाश व चुना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है
    , जबकि
    फास्फोरस
    , नाइट्रोजन व जीवांश का अभाव पाया जाता है।

2. लाल मिट्टी lal mrida

  • यह देश के लगभग 6.1 लाख वर्ग कि.मी. (18.6%) भू-भाग
    में है। इस मिट्टी का विकास आर्कियन ग्रेनाइट
    , नीस तथा
    कुड़प्पा एवं विंध्यन बेसिनो तथा धारवाड़ शैलों
    की अवसादी शैलो के उपर हुआ है। 
  • इनका
    लाल रंग लौह आक्साइड की उपस्थिति के कारण हुआ है। यह मिट्टी लवणीय प्रकार ही होती
    है। इसमें लोहा
    , एल्युमिनियम तथा चुने का अंश अधिक होता है 
    तथा जीवांश,
    नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की कमी पाई जाती है।




3. काली मिट्टी kali mrida 

  • इसमें जलधारण क्षमता सबसे अधिक होती है। स्थानीय भाषा में इसे रेगुर regur कहा जाता
    है। इसके अतिरिक्त यह मिट्टी उष्ण कटिचरनोजम तथा काली कपासी मिट्टी के नाम से जानी
    जाती है। इस मिट्टी का काला रंग टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट एवं जीवांष की उपस्थिति के
    कारण होता है। यह सर्वाधिक मात्रा में महाराष्ट्र में पाई जाती है। 
  • इसका निर्माण
    दक्कन ट्रेप के लावे
    से हुआ है। इनमें लोहे
    , चुने,
    कै
    ल्सियम
    ,
    पोटाश,
    एल्युमिनियम तथा मैग्नीशियम कार्बोनेट
    से समृद्ध होती है। इनमें जीवांश
    नाइट्रोजन व
    फास्फोरस
    की कमी पाई जाती है। यह जड़दार फसलो जैसे- कपास
    ,
    सोयाबीन, चना, तिलहन,
    खट्टे फलो तथा मोटे अनाजो के लिए उपयुक्त होती है।

4. लैटेरेराइट मिट्टी laterite mrida – 

यह देश के लगभग 1.26 लाख क्षेत्र में विस्तृत है। ये केरल,
महाराष्ट्र व असम में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाती है। इनका
स्वरूप ईंट के समान होता है तथा भीगकर यह कोमल हो जाती है। इनमें लौहा व एल्युमिनियम
प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा नाइट्रोजन
, पोटाश,
चूना व जैविक पदार्थो की इसमे प्रायः कमी पाई जाती है।

5. मरूस्थलीय मिट्टी marusthaliya mitti – 

यह राजस्थान, सौराष्ट्र, हरियाणा
तथा दक्षिणी पंजाब
में पाई जाती है। इसमें घुलनशील लवणो तथा फास्फोरस की प्रचुरता
पाई जाती है। सिंचाई द्वारा इसमें ज्वार
, बाजरा, मोटे अनाज व सरसो आदि उगाये जाते है। यह मिट्टी बाजरा, ज्वार व मोटे अनाजों की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

6. पर्वतीय मिट्टी parvatiya mitti – 

इसे वनीय मृदा भी कहा जाता है। ये नवीन अविकसित मृदा का रूप है जो कश्मीर से
अरूणाचल प्रदेश तक फैली हुई है। इसमें पोटाश
, चूना व
फास्फोरस का अभाव होता है
, परन्तु जीवांश प्रचुर मात्रा में
पाया जाता है। यह मृदा प्रायः अम्लीय स्वभाव की होती है।

7. पीट तथा दलदली मिट्टी pit aur daldali mitti – 

यह मृदा नम जलवायु में बनती है। सड़ी हुई वनस्पतियों से बनी पीट मिट्टी
सुन्दरवन
,
ओडिशा के तट,
बिहार के मध्यवर्ती भाग तथा केरल
व तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रो
में पाई जाती है। फैरस आयरन के कारण प्रायः इसका रंग
नीला होता है। इसमें कार्बनिक पदार्थो की मात्रा 40 से 50 प्रतिशत तक होती है। इस
प्रकार की मृदा में मैंग्रोव वनस्पतियाँ पाई 
जाती है।

8. लवणीय तथा
क्षारीय 
मिट्टी lavaniya aur chariya mitthi 

यूरेनियम एवं मैग्निसियम की अधिकता के कारण यह मिट्टी लवणीय/अम्लीय
तथा कैल्शियम व पोटेशियम
की अधिकता के कारण यह मिट्टी क्षारीय हो गई। ऐसी मृदा नहर
सिंचित तथा उच्च जल स्तर वाले

क्षेत्रों में
उत्पन्न हो गयी है। ये मिट्टियां रेह
, कल्लर,
ऊसर, राथड़, थूर,
चोपेन आदि अनेक स्थानीय नामों से जानी जाती है। 

  • अम्लीय /लवणीय मिट्टी का
    pH मान 7 से कम होता है। इसमें राक फास्फेट मिलाकर अम्लीयता को कम कर सकते
    हैं। 
  • क्षारीय मिट्टी का pH मान 7 से ज्यादा होता है। इसमें
    जिप्सम मिलाकर क्षारीयता को कम कर सकते हैं।

मृदा के प्रकार (पारिस्थितकी के आधार पर) पारिस्थितिकीय
आधार पर 
मिट्टी अधोलिखित प्रकार की होती है। 

1. अवशिष्ट मृदा avsist mrida 

जो मिट्टी बनने के स्थान पर ही पड़ी रहती है, उसे
अवशिष्ट मृदा कहा जाता है।

2. वाहित मृदा vahit mrida

यह मिट्टी बनने के स्थान से बहकर आई हुई होती है।

3. जलोढ मृदा jalodh mrida

जो मिट्टी जल द्वारा बहकर दुसरे स्थान पर पंहुचती है।

4. वातोढ मृदा vatodh mrida 

जो मिट्टी वायु द्वारा उड़कर दूसरे स्थान पर पंहुचती है।

5. शैल,
मलवा मृदा sail, malava mrida

जो मिट्टी पृथ्वी के आकर्षण के द्वारा एक स्थान से
दूसरे स्थान पर पंहुचती है।



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