भारत की जलवायु ! भारतीय जलवायु का वर्गीकरण Bharat Ki Jalvayu Climate of india

 upsc, state
pcs, cgpsc pre mains, ssc, bank, relway, defence, gk quiez, entrance exam
सभी परीक्षा के लिए  bharat ka
bhugol indian geography
के महत्‍वपूर्ण जानकारी पूर्ण सिलेबस के अनुसार notes के रूप में इस पोस्‍ट पर उपलब्‍ध है। 

भारत की जलवायु । bharat ki jalvayu ! भारतीय जलवायु का वर्गीकरण

भारत की जलवायु bharat ki jalvayu / limate of india
भारत की जलवायु bharat ki jalvayu / limate of india

भारत की जलवायु परिचय पृष्‍ठभूमि 

किसी देश विशेष
के जलवायु का अध्ययन करने के लिए वहां के तापमान
, वर्षा,
वायुदाब,
पवनो की गति व दिशा का ज्ञान होना
आवश्यक है। जलवायु के इन अवयवो पर अक्षांशीय विस्तार
, उच्चावच
एवं जल तथा स्थल के वितरण
का काफी प्रभाव पड़ता है। भारत का दक्षिणी भाग उष्ण
कटिबंध
में तथा उतरी भाग शीतोष्ण कटिबंध में है। 




भारत के उतर में स्थित हिमालय
पर्वत
भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया से अलग करता है और वहां से आने वाली ठण्डी
ध्रुवीय पवनो को रोकता है। हिन्द महासागर पर बहने वाली मानसूनी हवाओं का भारत की
जलवायु
पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है
, इसलिए भारत की जलवायु को
मानसूनी कहा जाता है।

  • 💬Top Most Selling Geography Books! Check Price list ! Amazon

भारत की जलवायु के बारे में मार्सडेन ने कहा है कि विश्व की समस्त प्रकार की जलवायु भारत में पाई जाती है।

जलवायु jalvayu :- किसी
विस्तृत क्षेत्र मे लम्बे समय (लगभग 35 वर्ष) तक तापमान
,
वायुदाब, आद्रता,
वर्षा एवं
हवाओ की दिशा एवं गति की दशाओं
की स्थिरता के आधार पर उस क्षेत्र की जलवायु का
निर्धारण होता है। उदा. – भारत की जलवायु
, छत्‍तीसगढ़ की जलवायु
आदि।


मौसम mausam:- किसी छोटे
क्षेत्र
के वातावरण में अल्पकालीन दशाओ (24 घंटे) के आधार पर मौसम का निर्धारण
किया जाता है। उदा. – बीकानेर का मौसम
, दिल्ली
का मौसम आदि

भारतीय जलवायु को
प्रभावित करने वाले कारक

  • अक्षांश akchans- भारत
    की मुख्य भूमि का अक्षांशीय एवं देशांतरीय विस्तार लगभग समान है। कर्क रेखा देश के
    मध्य से गुजरती है। इससे भारत का उतरी भाग शीतोष्ण तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटि.
    कहलाता है। इन दोनो क्षेत्रो में भूमध्य रेखा से दूरी के आधार पर जलवायु में
    विभिन्नता पाई जाती है।

  • हिमालय पर्वत himalaya parvat –
    उतर में उंचा हिमालय अपने सभी विस्तारो के साथ एक प्रभावी जलवायु विभाजक की भूमिका
    निभाता है। यह मानसून पवनो को रोककर उपमहाद्वीप में वर्षा का कारण बनता है।

  • जल व स्थल का
    वितरण jal va sthal ka vitran 
    – भारत के दक्षिण में तीन ओर हिन्द महासागर व उतर में हिमालय श्रेणीयां है।
    स्थल की अपेक्षा
    जल देरी से
    गर्म व ठण्डा होता है। जल और स्थल के इस विभेदी तापमान के कारण भारतीय
    उपमहाद्वीप में विभिन्न ऋतुओं में विभिन्नवायुदाब प्रदेश विकसित हो जाते है।

  • समुन्द्र तट से दूरी samudri tath se duri – लंबी तटीय रेखा के कारण भारत के विस्तृत तटीय प्रदेशो में समकारी जलवायु पाई जाती है,
    जबकि भारत के अन्दरूनी भाग समुन्द्र के समकारी प्रभाव से वंचित रह
    जाते है।

  • समुन्द्र तल से
    उंचाई
     samundra tal se uchai– उंचाई के बढने पर तापमान घटता है। विरल वायु के कारण पर्वतीय प्रदेश
    मैदानो 
    की तुलना में
    अधिक ठण्डे होते है। इसलिए एक ही अक्षांश पर स्थित होने के बाद भी तापमान व जलवायु 
    में विभिन्‍नता
    पाई जाती है।
  • जेट स्ट्रीम jet stream –
    शीतकाल में समुन्द्रतल से लगभग 8 कि.मी. की उंचाई पर पश्चिमी जेट स्ट्रीम अधिक
    तीव्र गति से समशीतोष्ण कटि. के उपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणीयो
    द्वारा दो भागो में विभाजित हो जाती है। उतरी शाखा हिमालय के उतरी सिरे के सहारे
    चलती है जबकि दक्षिणी शाखा हिमालय के दक्षिण में 200 से 350 उतरी अक्षांश के मध्य
    पूर्व की ओर चलती है। यही शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओ को प्रभावित करती है।
  • एल-नीनो तथा
    ला-निना  al-nino and la-nina
    – एल-नीनो पेरू तट के पश्चिम में 180 कि.मी. की दूरी से उतर पश्चिम में चलने
    वाली एक गर्म जलधारा है
    , जो प्रशान्त महासागर से
    होकर हिन्द महासागर में प्रविष्ट कर भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर करती है।



  • एल-नीनो के
    प्रभाव
    से पूर्वी प्रशांत गर्म तथा पश्चिमी प्रशान्त ठण्डा हो जाता है इससे भारत
    का
      दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़
    जाता है। इसे ही एल-नीनो प्रभाव के नाम से जाना जाता है। इसे विपरित धारा के नाम
    से जाना जाता है। जिस वर्ष एल-नीनो नही आते है उस वर्ष भारतीय मानसून सामान्य रहता
    है।
  • पेरू तट से चलने
    वाली शीतल जलधारा हम्बोल्ट या ला-निना कहलाती है। यह प्रशांत महासागर में उस समय
    आती है जब पूर्वी प्रशांत महासागर में एल-नीनो का प्रभाव समाप्त हो जाता है। यह
    जलधारा एल-नीनो द्वारा जनित सुखे को बदल कर आद्र स्थिति को जन्म देती है। इससे
    भारत में ग्रीष्मकालीन मानसुन अधिक सक्रिय हो जाता है।

मानसूून | Monsoon

  •  मानसून की
    खोज
    सर्वप्रथम हिप्पलस नामक भूगोलवेता ने की थी। भारतीय मानसून का सटीक विवरण सर्वप्रथम
    अलमसूदी द्वारा प्रस्तुत किया गया। 
  • कोपेन का जलवायु वर्गीकरण भारत के सन्दर्भ में
    अधिक 
    विश्वसनीय माना
    जाता है। मानसून शब्द मूलतः अरबी भाषा के
    मौसिम
    से बना है जिसका अर्थ है वर्ष भर में
  • पवनो की दिशा में
    होने वाला ऋतुवत प्रत्यावर्तन
    , जो कि मौसम अथवा ऋतु
    निर्धारण का प्रधान कारक है। भारत में मानसून के आगमन पर हवाएं दक्षिण पश्चिम से
    उतर पूर्व दिशा
    में चलती है। मानसून के लौटते समय ये हवाएं उतर पूर्व से दक्षिण
    पश्चिम हो जाती है। हवाओ का यह प्रत्यावर्तन ही मानसून है।
  •  मानसून शब्द का
    सर्वप्रथम
    प्रयोग अरब सागर पर बहने वाली हवा के लिए किया गया। भारतीय मानसून का
    वर्णन सर्वप्रथम अरब विद्वान अल सूदी के द्वारा किया गया।

भारतीय मानसून की
उत्पति के संबन्ध में दो प्रकार की संकल्पलनाएं दी गई है-

1. तापीय
संकल्पना – हैले द्वारा 1686 में

2. गतिक संकल्पना
– फ्लान द्वारा


भारत की जलवायु bharat ki jalvayu / limate of india
भारत की जलवायु bharat ki jalvayu / limate of india



ऋतुओं के अनुसार
भारत में मानसून के तीन प्रकार है-

(1) ग्रीष्मकालीन
मानसून grism kalin monsoon – 

इसे दक्षिण पश्चिमी मानसून भी कहा जाता है। भारत में दक्षिण पश्चिमी मानसून की दो
शाखाएं है
, जो निम्नानुसार है-




अरब सागरीय मानसून की शाखा arab sagariya monsoon ki shakha

  • विषुवत रेखा के दक्षिण से आने वाली स्थायी पवने
    जब मानसून के रूप में अरब सागर की ओर आगे बढती है तो सबसे पहले प. घाट से टकराकर
    केरल में वर्षा करती है।
  • पश्चिमी घाट के पर्वत को पार करते समय इनकी शुष्कता में वृद्धि हो जाती है। जिसके  कारण दक्कन के पठार व मध्य
    प्रदेश में बहुत कम वर्षा होती है। यह प्रदेश वृष्टि छाया प्रदेश के अन्तर्गत आता
    है।
  • अरावली के समान्तर पाए जाने के कारण राजस्थान में अरब सागरीय मानसून की बहुत कम
    वर्षा हो पाती है।
  • यह मानसून हिमालय के समान्तर बंगाल की खाड़ी के मानसून में मिल जाता है तथा पंजाब
    में सबसे अधिक वर्षा करता है।

बंगाल की खाडी़  का मानसून bengal ki khadi ka monsoon

  • यह दक्षिण पश्चिम मानसून की वह शाखा है, जो
    भूमध्य रेखा को पार करके भारत में दक्षिण-पूर्व दिशा से प्रवेश करती है।
  • प्रायद्वीपीय भारत व पूर्वोतर भारत के निम्न वायुदाब के प्रभाव से यह दो शाखाओं
    मेंविभक्त हो जाती है।
  • इसकी एक शाखा गंगा के मैदानो की तरफ बढती है तथा दूसरी ब्रह्मपुत्र के की घाटी की तरफ
    बढती है। इससे उतर पूर्व भारत में भारी वर्षा होती है।
  • यह मानसून भारत में सबसे पहले बंगाल तट से टकराता है तथा इससे मासिनराम व
    चेरापुंजी
    में सर्वाधिक वर्षा होती है।

(2) शरद ऋतु
मानसून lautata hua monsoon (लौटता हुअुआ मानसून /मानसून प्रत्यावर्तन) 

  • मध्य सितम्बर से नवंबर
    तक भारत में शरद ऋतु देखने को मिलती है।
  • इस ऋतु में सूर्य की स्थिति 23 सितम्बर के बाद दक्षिणायन में हो जाती है,
    जिससे उतर भारत के क्षेत्रो में तापमान में कमी देखने को मिलती है
    तथा वहां कम वायुदाब के स्थान पर उच्च वायुदाब के क्षेत्र बनने लगते है।
  • इसी ऋतु में उतर पूर्व से हवाएं दक्षिण पश्चिम की ओर चलना शुरू कर देती है,
    इससे आन्ध्रप्रदेशतमिलनाडू के तटो पर वर्षा होती है।
  •  यह मानसून सितम्बर के पहले सप्ताह से शुरू होकर दिसम्बर के अंतिम सप्ताह तक चलती है।

(3) शीत ऋतु
मानसून shit rithu monsoon

  •  इस ऋतु का आगमन नवम्बर के बाद से होता है।
  •  इस ऋतु में भुमध्यसागर के उपर उठने वाले विक्षोभो को उपरी वायु के संचरण वाली जेट पवने
    पश्चिम से पूरव दिशा में बहाकर इराक
    ,
    इरान व पाकिस्तान के क्षेत्रो से होती हुई भारत के उतरी भाग तक ले
    जाती है।
  •  इन विक्षोभो को पश्चिमी विक्षोभ तथा इनसे होने वाली वर्षा को पश्चिमी विक्षोभो से
    होने वाली वर्षा कहा जाता है।
  • उतर भारत के पर्वतीय भागो में इन विक्षोभो से वर्षण हिमपात के रूप में होता है,
    जबकि राजस्थान, पंजाब, हरियाणा
    आदि क्षेत्रो में ये वर्षा के लिए उतरदायी है जिसे मावठ कहा जाता है।

भारतीय जलवायु से
सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य bhartiya jalvayu se sambhandit mahatyapurna facts




  •  भारत में सर्वाधिक वर्षा पर्वतीय वर्षा के रूप
    में होती है।
  •  कश्मीर मे ट्रांस हिमालय के अधिकांश भाग में वर्षा
    नही हो पाने के कारण वह क्षेत्र शीत मरूस्थल कहलाता है।
  •  उडी़सा में जाडे़ के मौसम में वर्षा होती है। इसे
    स्थानीय भाषा में नार्वेस्टर कहा जाता है।
  •  भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला राज्य मेघालय है।
  •  मासिनराम व चेरापुंजी में सर्वाधिक वर्षा होने का
    कारण वहां की पहाड़ीयों का कीपनुमा होना भी है।
  •  विश्व व भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम
    है
    ,
    जहां पर 1141 सेमी वर्षा होती है।
  •  विश्व में न्युनतम वर्षा वाला स्थान अरिका नगर,
    चिल्ली है।
  •  भारत में न्युनतम वर्षा वाला स्थान लेह,
    लद्दाख है।
  •  मालाबार तट पर होने वाली मानसून की पहली वर्षा
    पीली वर्षा//येलो शावर/मैंगो शावर/आम्र वर्षा कहलाती है।
  •  कोंकण तट पर मानसून की पहली वर्षा फुलो की
    वर्षा/चेरी ब्लाजॅम
      cheri blosom कहलाती है।
  • असम व प.बंगाल में मानसून पूर्व वैशाख माह में
    चलने वाली तेज वर्षायुक्त हवाए काल वैशाखी कहलाती है
    ,
    जो चाय, पटसन व चावल के लिए वरदान सिद्ध होती
    है। असम में इसे बारदोली छीडा़ अथवा चाय वर्षा chai varsha कहा 
    जाता है।
  • पश्चिम से पूर्व मे चलने वाली पवने पछुआ तथा
    पूर्व से पश्चिम में चलनें वाली हवाएं व्यापारिक पवने कहलाती है।
  • शीतकाल में होने वाली वर्षा को मावठ/गोल्डन
    ड्राप्प्स
     golden drops कहा जाता है। यह गेंहू के लिए उपयोगी होती है।
  •  वर्तमान में चेरापुंजी का नाम बदल कर सोहरा कर
    दिया गया है।
  • लेह भारत में सर्वाधिक वार्षिक वर्षा में विषमता
    वाला स्थान है।
  •  केरल में मानसून की अवधि 5 जुन से 30 नवम्बर है,
    जबकि पंजाब के मैदान में यह अवधि 1 जुलाई से 20 सितम्बर तक होती है।
  •  अक्टुबर से नवम्बर को मानसून का प्रत्यावर्तन काल
    कहा जाता है।
  •  ऋगवेद में पांच ऋतुओ का वर्णन किया गया है
    जिसमें बंसत को ऋतुराज कहा गया है।
  •  मानसून के निवर्तन/प्रत्यावर्तन से सर्वाधिक वर्षा
    चैन्नई
    में होती है।
  •  भारत मे 80 प्रतिशत से अधिक वर्षा जून से लेकर
    सितम्बर
    तक के चार महिनो में होती है।


 भारत की जलवायु को मुख्य रूप से तीन ऋतुओं में
बांटा गया है-

1 शीत ऋतु shit ritu –
दिसम्बर से फरवरी तक

2 ग्रीष्‍म ऋतु grism ritu – मार्च से जून तक

3 वर्षा ऋतु varsha ritu –
मध्य जून से सितम्बर तक


कोपेन के अनुसार जलवायु वर्गीकरण

कोपेन के
अनुसार
भारत के जलवायु प्रदेश कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में तापमान व वर्षा
के मासिक मानको को आधार माना है। उन्होने जलवायु के पांच प्रकार माने है
,
जिनके नाम है-




1. उष्ण कटि.
जलवायु usna katibandhiya jalvayu 
– जहां वर्ष भर औसत मासिक तापमान 18 सेल्सियस से अधिक रहता है।

2. शुष्क जलवायु suska jalvayu – जहां तापमान की तुलना में वर्षा बहुत कम होती है। शुष्कता कम होने पर यह अर्ध शुष्क
मरूस्थल कहलाता है
, तथा शुष्कता अधिक होने पर
यह मरूस्थल होता है।

3. गर्म जलवायु garm jalvayu –
जहां सबसे ठण्डे महिने का औसत तापमान 18 सेल्सियस और -3 सेल्सियस के बीच रहता
है।

4. हिम जलवायु him jalvayu-
जहां सबसे गर्म महिने का औसत तापमान 1 सेल्सियस से अधिक और सबसे ठण्डे महिने का
औसत तापमान 3सेल्सियस से कम रहता है।

5. बर्फीली
जलवायु barphili jalvayu –
जहां सबसे गर्म महिने का औसत तापमान 10सेल्सियस से कम रहता है।


कोपेन ने जलवायु
के प्रकारो को दर्शाने के लिए वर्ण संकेतो का प्रयोग किया है
,
जो इस प्रकार से है-

संकेत

अर्थ

s

अर्द्ध मरूस्‍थल

w

मरूस्‍थल

f

वर्षा

w

शुष्‍क शीत ऋतु

h

शुष्‍क और गर्म

c

4 महिने से कम अवधि का औसत तापमान 100 सेल्सियस
से अधिक

g

गंगा का मैदान

भारत के 8 जलवायु
प्रदेश जो कोपेन द्वारा माने गए 

संकेत

जलवायु के प्रकार

क्षेत्र

Amw

लघु शुष्‍क ऋतु वाला मानसुन

गोवा के दक्षिण में भारत का प0 तट

As

शुष्‍क ग्रीष्‍म ऋतु वाला मानसुन

तमिलनाडु को कोरोमंडल तट

Aw

उष्‍ण कटिबंधीय सवाना प्रकार

कर्क रेखा के द0 का प्रायद्विपीय पठार

BShw

अर्द्ध शुष्‍क स्‍टेपी जलवायु

उत्तर-पश्चिमी गुजरात, पश्चिमीराजस्‍थान, व पंजाब का कुछ भाग

BWhw

गर्म मरूस्‍थल

पश्चिमी राजस्‍थान

Cwg

शुष्‍क शीत ऋतु वाला

गंगा का मैदान

Dfc

लघु ग्रीष्‍म तथा ठण्‍डी आर्द्र शीत ऋतु वाला जलवायु
प्रदेश

अरूणाचल प्रदेश

E

ध्रवीय प्रकार

जम्‍मु कश्‍मीर, हिमाचल
व उत्तराखण्‍ड


tags- भारतीय जलवायु का वर्गीकरण


Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *